
संपूर्ण कथा
कुंती ने कन्या अवस्था में ऋषि दुर्वासा से प्राप्त मंत्र की परीक्षा के लिए सूर्यदेव का आह्वान किया और कवच-कुंडल सहित एक पुत्र पाया। लोकलाज के भय से उन्होंने उस शिशु को पेटी में रखकर नदी में बहा दिया। सूत अधिरथ और राधा ने उसे पाला और उसका नाम कर्ण रखा।
युद्ध से पहले श्री कृष्ण ने कर्ण को उसका जन्म रहस्य बताया और पांडवों के पक्ष में आने को कहा, पर कर्ण ने मित्र दुर्योधन का साथ छोड़ने से इनकार कर दिया। इसके बाद कुंती स्वयं कर्ण से मिलीं और सत्य बताया।
कर्ण ने माता को आदर दिया पर पक्ष नहीं बदला। उन्होंने वचन दिया कि अर्जुन को छोड़कर वे किसी पांडव का वध नहीं करेंगे, और इस प्रकार कुंती के पाँच पुत्र सदा बने रहेंगे, चाहे अर्जुन रहे या कर्ण।
कथा का संदेश
मित्रता का वचन और कृतज्ञता निभाना बड़े संघर्ष में भी चरित्र की पहचान है।
