
संपूर्ण कथा
पांडवों ने वनवास और अज्ञातवास पूरा कर लिया, पर दुर्योधन ने उनका राज्य लौटाने से इनकार कर दिया। युद्ध टालने के लिए श्री कृष्ण स्वयं शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर पहुँचे।
दुर्योधन ने उन्हें राजकीय भोज के लिए आमंत्रित किया, पर कृष्ण ने उसे अस्वीकार करके विदुर के घर साधारण भोजन किया, क्योंकि वहाँ प्रेम और सच्चा आतिथ्य था। कृष्ण ने कुंती से भी भेंट की।
कृष्ण ने राजसभा में पांडवों के लिए केवल पाँच गाँव माँगे, पर दुर्योधन ने सुई की नोक के बराबर भूमि देने से भी इनकार कर दिया और कृष्ण को बंदी बनाने का प्रयास किया। तब कृष्ण ने अपना विराट रूप दिखाया। शांति के सभी प्रयास विफल होने पर महाभारत का युद्ध अनिवार्य हो गया।
कथा का संदेश
प्रेम का भोजन वैभव के भोज से श्रेष्ठ है, और अहंकार शांति के हर अवसर को ठुकरा देता है।
