Pauranik Katha

दानवीर कर्ण और कवच-कुंडल का दान

अपने प्राणों की रक्षा करने वाले कवच और कुंडल भी दान कर देने वाले कर्ण की कथा।

दानवीर कर्ण और कवच-कुंडल का दान कथा

संपूर्ण कथा

कर्ण कुंती और सूर्यदेव के पुत्र थे, जो जन्म से ही दिव्य कवच और कुंडल के साथ उत्पन्न हुए थे। इन्हें धारण करने तक कर्ण को कोई शस्त्र मार नहीं सकता था। उनका पालन सूत अधिरथ और राधा ने किया। वे अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध थे और कोई भी याचक उनसे खाली हाथ नहीं लौटता था।

इंद्र को अपने पुत्र अर्जुन की चिंता हुई। उन्होंने ब्राह्मण का वेश धारण करके कर्ण से कवच-कुंडल माँगने का निश्चय किया। सूर्यदेव ने स्वप्न में कर्ण को चेताया, पर कर्ण ने कहा कि मैं याचक को मना नहीं कर सकता।

कर्ण ने अपने शरीर से कवच और कुंडल काटकर इंद्र को दे दिए। उनकी उदारता से प्रसन्न होकर इंद्र ने उन्हें एक अमोघ शक्ति प्रदान की, जिसका प्रयोग वे केवल एक बार कर सकते थे। इसी कारण कर्ण 'दानवीर' कहलाए।

कथा का संदेश

सच्चा दानी वही है जो अपने हित से ऊपर उठकर दूसरों की याचना का मान रखे।

सामान्य प्रश्न

यह कथा Sanatan Seva ऐप में सुनें, ऑडियो कथा के रूप में

संबंधित सामग्री

सभी कथाओं पर वापस जाएँ