
संपूर्ण कथा
देवताओं और असुरों के युद्ध में असुरगुरु शुक्राचार्य अपनी संजीवनी विद्या से मरे हुए असुरों को जीवित कर देते थे। देवताओं ने बृहस्पति के पुत्र कच को यह विद्या सीखने के लिए शुक्राचार्य के पास भेजा। कच ने गुरु और उनकी पुत्री देवयानी की सेवा करके उनका विश्वास जीता।
असुरों ने कच को दो बार मार दिया, पर देवयानी के आग्रह पर शुक्राचार्य ने उसे जीवित कर दिया। तीसरी बार असुरों ने उसकी राख मदिरा में मिलाकर शुक्राचार्य को पिला दी। तब कच ने गुरु के पेट में रहकर ही विद्या सीख ली और फिर बाहर आकर उन्हें भी पुनर्जीवित किया।
इसके बाद शुक्राचार्य ने ब्राह्मणों के लिए मदिरा निषिद्ध कर दी। देवयानी ने कच से विवाह का प्रस्ताव रखा, पर कच ने गुरु-पुत्री को बहन समान बताकर मना कर दिया। क्रोध में देवयानी ने शाप दिया कि यह विद्या तुम्हारे काम नहीं आएगी, और कच ने शाप दिया कि तुम्हारा विवाह किसी ब्राह्मण से नहीं होगा।
कथा का संदेश
विद्या और मर्यादा का पालन कठिन परिस्थितियों में भी चरित्र को ऊँचा बनाए रखता है।
