
संपूर्ण कथा
देवगिरि पर्वत के निकट सुधर्मा नामक एक धर्मात्मा ब्राह्मण अपनी पत्नी सुदेहा के साथ रहते थे। संतानहीन होने के कारण सुदेहा के ही आग्रह पर सुधर्मा ने उसकी छोटी बहन घुष्मा से दूसरा विवाह किया। घुष्मा परम शिवभक्त थी और प्रतिदिन मिट्टी के एक सौ एक पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजाोपरांत उन्हें सरोवर में विसर्जित करती थी।
महादेव की कृपा से घुष्मा को एक सुंदर और तेजस्वी पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। पुत्र के बड़े होने पर सुदेहा के मन में ईर्ष्या की ज्वाला धधक उठी। एक रात्रि ईर्ष्या के वशीभूत होकर सुदेहा ने उस सोते हुए बालक का वध कर दिया और उसके शव को उसी सरोवर में फेंक दिया।
प्रातःकाल जब रक्त देखकर पूरे घर में हाहाकार मचा, तब भी घुष्मा ने अपना नित्य नियम नहीं छोड़ा। उसने शांत मन से कहा, 'जिसने दिया था, वही रक्षा करेगा।' वह सरोवर तट पर गई, पार्थिव लिंगों का पूजन किया और विसर्जन किया। जैसे ही अंतिम लिंग जल में समाया, उसका मृत पुत्र सरोवर से जीवित मुस्कुराता हुआ बाहर आ गया।
उसी क्षण देवाधिदेव महादेव त्रिशूल ताने प्रकट हुए और सुदेहा को दंड देने बढ़े। किंतु घुष्मा ने प्रभु के चरण पकड़कर अपनी बहन के लिए क्षमा की भीख मांगी। भक्त की इस असीम करुणा से अभिभूत होकर महादेव ने घुष्मा के नाम पर वहीं 'घुष्मेश्वर' (घृष्णेश्वर) ज्योतिर्लिंग के रूप में वास किया।
कथा का संदेश
असीम क्षमा और निष्काम भक्ति के सम्मुख मृत्यु और काल भी नतमस्तक हो जाते हैं।
