
संपूर्ण कथा
लंकापति रावण का वध कर जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण सहित लौटे, तो मुनिवरों ने स्मरण कराया कि यद्यपि रावण अधर्मी था, किंतु वह पुलस्त्य ऋषि का पौत्र और प्रकांड वेदपाठी ब्राह्मण था। अतः ब्रह्म-हत्या के प्रायश्चित और लोक-मर्यादा हेतु समुद्र तट पर शिव-प्रतिष्ठा आवश्यक है।
श्री राम ने हनुमान जी को कैलाश पर्वत जाकर शुभ मुहूर्त से पूर्व एक दिव्य शिवलिंग लाने का आदेश दिया। हनुमान जी त्वरित गति से कैलाश गए, किंतु उपयुक्त लिंग प्राप्त करने में उन्हें विलंब हो गया और स्थापना का शुभ लग्न निकट आ गया।
मुहूर्त व्यतीत न हो जाए, इस हेतु महर्षि अगस्त्य के परामर्श पर माता सीता ने समुद्र तट की पावन बालू (रेत) को अपने हाथों में संजोकर एक सुंदर पार्थिव शिवलिंग का निर्माण किया। श्री राम ने विधिवत मंत्रोच्चार के साथ उस लिंग की प्रतिष्ठा की, जो 'रामलिंगेश्वर' कहलाया।
जब हनुमान जी दिव्य लिंग लेकर लौटे और पूजा संपन्न देखी, तो उन्हें संकोच हुआ। प्रभु श्री राम ने उनके श्रम का मान रखते हुए उस कैलाशी लिंग को भी समीप ही स्थापित करवाया और यह मर्यादा बांधी कि जो भी भक्त आएगा, वह सर्वप्रथम हनुमान जी द्वारा लाए गए लिंग का दर्शन करेगा।
कथा का संदेश
भगवान राम और शिव एक-दूसरे के पूरक हैं; हरि और हर में कोई भेद नहीं होता।
