Pauranik Katha

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग: दारुक असुर का अंत और भक्त सुप्रिय का उद्धार

दारुक वन में बंदी बनाए गए शिवभक्त सुप्रिय की करुण पुकार पर प्रकट हुए नागों के अधिपति भगवान शिव की विजय गाथा।

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग: दारुक असुर का अंत और भक्त सुप्रिय का उद्धार कथा

संपूर्ण कथा

प्राचीन समय में समुद्र तटवर्ती दारुक वन में दारुक और उसकी पत्नी दारुका नाम के अत्यंत क्रूर असुर रहते थे। उन्हें देवी पार्वती से प्राप्त वरदान का अभिमान था, जिसके बल पर वे धर्मनिष्ठ संतों, यात्रियों और प्रजा पर भीषण अत्याचार करते थे।

एक बार सुप्रिय नामक परम शिवभक्त वैश्य को नौका सहित दारुक ने बंदी बना लिया और अपने अन्य साथियों के साथ कारागार में डाल दिया। घोर यातनाओं के बीच भी सुप्रिय का शिव-विश्वास तनिक भी न डिगा। उसने कारागार के भीतर ही पार्थिव लिंग बनाकर सभी बंदियों को पंचाक्षर मंत्र की साधना में लगा दिया।

क्रुद्ध दारुक जब हाथ में गदा लेकर सुप्रिय का वध करने पहुंचा, तब सुप्रिय ने भयभीत न होकर आर्तभाव से त्रिलोकीनाथ शिव को पुकारा। उसी क्षण कारागार की भूमि फट गई और एक दिव्य रत्नजड़ित मंडप में ज्योतिर्लिंग रूप में साक्षात शिव प्रकट हुए।

महादेव ने अपने पाशुपतास्त्र से असुरों का संहार कर धर्म की पुनः स्थापना की और सुप्रिय के अनुरोध पर सदा के लिए 'नागेश्वर' (विष और नागों के स्वामी) के रूप में वहां वास किया।

कथा का संदेश

विपत्ति के अंधकार में भी जो भक्त ईश्वर का नाम नहीं छोड़ता, प्रभु उसके समक्ष स्वयं प्रकट होते हैं।

सामान्य प्रश्न

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