
संपूर्ण कथा
लंकाधिपति रावण भगवान शिव का अनन्य भक्त था। वह चाहता था कि महादेव सदा के लिए लंका में निवास करें ताकि उसकी नगरी अजेय बन जाए। इस मनोरथ से उसने कैलाश पर्वत पर घोर तप किया। जब शिवजी प्रकट नहीं हुए, तो रावण ने एक-एक कर अपने नौ शीश काटकर हवन कुंड में समर्पित कर दिए।
जैसे ही वह अपना दसवां मस्तक काटने को उद्यत हुआ, आशुतोष भगवान शिव प्रकट हो गए। उन्होंने एक कुशल वैद्य की भांति रावण के समस्त शीश पुनः जोड़ दिए और उसे आरोग्य का दान दिया, जिससे इस रूप का नाम 'वैद्यनाथ' पड़ा।
रावण ने वरदान स्वरूप महादेव के शिवलिंग को लंका ले जाने की अनुमति मांगी। शिवजी ने शर्त रखी कि मार्ग में जहां भी यह लिंग भूमि पर रख दिया जाएगा, यह वहीं अचल रूप से स्थापित हो जाएगा।
देवताओं के अनुरोध पर भगवान विष्णु ने एक चरवाहे का रूप धरकर रावण से वह लिंग कुछ क्षणों के लिए थामा और रावण के दूर जाते ही उसे भूमि पर रख दिया। रावण ने लौटकर अपनी संपूर्ण शक्ति से शिवलिंग को उखाड़ने का प्रयास किया, किंतु वह तिल भर भी न हिला। अंततः हताश होकर रावण वहीं पूजा कर लौट गया और वह पावन धाम 'वैद्यनाथ' कहलाया।
कथा का संदेश
भक्ति जब अहंकार और स्वार्थ से युक्त होती है, तो वह सिद्धि के स्थान पर बंधन बन जाती है।
