
संपूर्ण कथा
प्राचीन काल में ब्रह्मगिरि पर्वत के अंचल में भीषण अकाल पड़ा। महर्षि गौतम ने अपनी कठोर साधना से वरुण देव को प्रसन्न कर एक अक्षय जल-कुंड प्राप्त किया, जिसके माध्यम से वे समस्त क्षेत्रवासियों और मुनियों का अन्न-जल से पालन करने लगे।
ऋषि गौतम की बढ़ती कीर्ति को देखकर कुछ ईर्ष्यालु ब्राह्मणों ने एक मायावी दुर्बल गाय को उनके धान्य-क्षेत्र में भेज दिया। महर्षि गौतम ने जब कुश के तिनके से उस गाय को बाहर निकालना चाहा, तो वह वहीं गिरकर निष्प्राण हो गई। अन्य मुनियों ने उन पर गो-हत्या का मिथ्या कलंक लगाकर उनका बहिष्कार कर दिया।
परम ज्ञानी गौतम ऋषि ने व्यथित होकर भगवान शिव की घोर तपस्या की। उनकी निष्कपट भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी प्रकट हुए और उन्होंने स्पष्ट किया कि गौतम निष्पाप हैं और यह सब दुष्टों का षड्यंत्र था।
महादेव के वरदान मांगने पर महर्षि ने अपने अपकारियों को क्षमा करते हुए प्रार्थना की कि लोक-कल्याण हेतु मां गंगा यहां प्रवाहित हों। गंगा जी ने 'गौतमी' (गोदावरी) के रूप में अवतरित होना तभी स्वीकार किया जब शिवजी भी वहां रहें। अतः महादेव वहां ब्रह्मा, विष्णु और महेश के त्रिदेव स्वरूप 'त्र्यंबकेश्वर' ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए।
कथा का संदेश
सच्चे साधक पर लगाए गए झूठे आरोप भी अंततः उसके यश और ईश्वरीय अनुग्रह का कारण बनते हैं।
