Pauranik Katha

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग: अनादि ज्योतिस्तंभ और मोक्षनगरी काशी

ब्रह्मा और विष्णु के मान-मर्दन हेतु प्रकट हुए आदि-अनादि अग्नि-स्तंभ और त्रिशूल पर टिकी मोक्षदायिनी काशी की कथा।

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग: अनादि ज्योतिस्तंभ और मोक्षनगरी काशी कथा

संपूर्ण कथा

सृष्टि के आरंभ में भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के मध्य यह संशय उत्पन्न हुआ कि इस संपूर्ण ब्रह्मांड का मूल कारण और श्रेष्ठ कर्ता कौन है। दोनों के इस अहंकार और भ्रम को दूर करने के लिए उन दोनों के मध्य एक अत्यंत देदीप्यमान, असीम ज्योतिस्तंभ प्रकट हुआ, जिसका न कोई आदि था और न कोई अंत।

दोनों देवों ने उस स्तंभ के छोर का पता लगाने का निर्णय लिया। ब्रह्मा जी हंस रूप धरकर आकाश की ओर उड़े और श्रीहरि विष्णु वराह रूप धरकर पाताल की गहराई में उतरे। सहस्त्रों वर्षों के अनुसंधान के उपरांत भी जब किसी को उसका ओर-छोर न मिला, तब वे नतमस्तक होकर स्तुति करने लगे।

उस ज्योतिर्मय लिंग के मध्य से परमेश्वर शिव प्रकट हुए और उन्होंने दोनों देवों को अपने-अपने दायित्वों का बोध कराया। यही महाज्योतिर्लिंग समस्त ज्योतिर्लिंगों का मूल माना गया।

महादेव ने इस परम ज्योति का एक शाश्वत अंश अपनी प्रिय नगरी काशी में स्थापित किया, जो 'काशी विश्वनाथ' कहलाया। मान्यता है कि प्रलय काल में भी यह नगरी नष्ट नहीं होती, क्योंकि स्वयं भगवान शिव इसे अपने त्रिशूल की नोक पर धारण कर लेते हैं।

कथा का संदेश

परम सत्य अनादि और अनंत है; अहंकार का त्याग करने पर ही परमात्मा के दिव्य स्वरूप का दर्शन होता है।

सामान्य प्रश्न

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