
संपूर्ण कथा
रामायण काल के उपरांत रावण के भ्राता कुंभकर्ण और कर्कटी के पुत्र भीम को जब यह ज्ञात हुआ कि उसके पिता का वध श्री राम द्वारा हुआ था, तो वह प्रतिशोध की ज्वाला में जलने लगा। उसने सह्याद्रि पर्वत पर ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर असीम बल का वरदान प्राप्त कर लिया।
वरदान के मद में चूर होकर उसने तीनों लोकों पर आक्रमण कर दिया और कामरूप के परम शिवभक्त राजा सुदक्षिण को पराजित कर कारागार में डाल दिया। राजा सुदक्षिण ने कारागार के भीतर ही मिट्टी का पार्थिव शिवलिंग बनाकर एकाग्रचित्त होकर भगवान शिव की स्तुति आरंभ कर दी।
जब असुर भीम ने सुदक्षिण को शिवलिंग की पूजा करते देखा, तो वह अट्टहास करते हुए शिवलिंग को खड्ग से काटने दौड़ा। जैसे ही उसकी तलवार उस पार्थिव लिंग को स्पर्श करने वाली थी, उसी क्षण शिवलिंग विदीर्ण हुआ और स्वयं देवाधिदेव महादेव प्रकट हो गए।
भगवान शिव ने अपनी पिनाक की टंकार और त्रिशूल से उस दुराचारी असुर का संहार किया। इस भीषण युद्ध के उपरांत महादेव के शरीर से जो स्वेद (पसीना) प्रवाहित हुआ, वही पावन 'भीमा नदी' के रूप में बह निकला और प्रभु वहीं 'भीमाशंकर' ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
कथा का संदेश
भक्त की निष्काम पूजा पर जब भी विपत्ति आती है, ईश्वर स्वयं ढाल बनकर उपस्थित होते हैं।
