Pauranik Katha

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग: पांडवों का पश्चाताप और महिष स्वरूप शिव

महाभारत युद्ध के उपरांत गोत्र-हत्या के पाप से मुक्ति पाने हेतु पांडवों द्वारा शिव की खोज और केदार खंड में ज्योतिर्लिंग प्राकट्य।

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग: पांडवों का पश्चाताप और महिष स्वरूप शिव कथा

संपूर्ण कथा

कुरुक्षेत्र के भीषण संग्राम में विजय प्राप्त करने के पश्चात पांडवों के मन में अपने बंधु-बांधवों और गुरुजनों के संहार के कारण भारी ग्लानि और पश्चाताप था। भगवान श्री कृष्ण और महर्षि वेदव्यास के परामर्श पर पांडव गोत्र-हत्या के पाप से मुक्ति हेतु भगवान शिव की शरण में हिमालय की ओर चल पड़े।

महादेव पांडवों के युद्ध-कर्म से रुष्ट थे और उन्हें सहज दर्शन नहीं देना चाहते थे। जब पांडव गुप्तकाशी पहुंचे, तो शिवजी ने एक विशाल महिष (बैल) का रूप धारण कर लिया और पशुओं के झुंड में सम्मिलित हो गए।

महाबली भीम ने अपने विराट रूप से दो पर्वतों पर पैर फैला दिए, जिससे अन्य पशु तो निकल गए परंतु महिष रूपी शिव झुकने को तैयार न हुए। भीम ने जैसे ही उस महिष को पहचान कर पकड़ा, वह भूमि में समाने लगा। भीम ने बलपूर्वक महिष के पिछले भाग (पृष्ठ भाग) को थाम लिया।

पांडवों के इस अटूट संकल्प और भक्ति से द्रवित होकर महादेव ने उन्हें समस्त पापों से मुक्त किया। महिष का वह कूबड़ (पृष्ठ भाग) वहीं केदारनाथ में पावन ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रतिष्ठित हुआ, जबकि अन्य चार अंग हिमालय के विभिन्न भागों में प्रकट होकर पंच-केदार कहलाए।

कथा का संदेश

कपट रहित पश्चाताप और दृढ़ भक्ति के सम्मुख ईश्वर की अप्रसन्नता भी कृपा में बदल जाती है।

सामान्य प्रश्न

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