Pauranik Katha

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग: विंध्याचल की तपस्या और ओंकार स्वरूप

विंध्याचल पर्वत के अहंकार निवारण, पार्थिव शिवलिंग की घोर साधना और ओंकारेश्वर-ममलेश्वर के प्राकट्य का वृत्तांत।

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग: विंध्याचल की तपस्या और ओंकार स्वरूप कथा

संपूर्ण कथा

एक समय देवर्षि नारद भ्रमण करते हुए विंध्याचल पर्वत पर पहुंचे। विंध्याचल ने जब गर्व से अपनी विशालता और संपदा का वर्णन किया, तब नारद जी ने सहज भाव से कहा कि सुमेरु पर्वत तुमसे कहीं अधिक उन्नत और देवताओं का निवास स्थान है। यह सुनकर विंध्याचल का गर्व खंडित हो गया और वह अत्यंत खिन्न हुआ।

आत्मग्लानि और श्रेष्ठता की कामना से विंध्याचल नर्मदा तट पर मांधाता द्वीप पहुंचा। वहां उसने मिट्टी का पार्थिव शिवलिंग निर्मित किया और छह मास तक बिना अन्न-जल केवल महादेव के पंचाक्षर मंत्र का जप करते हुए कठोर तप किया।

उसकी निष्कपट तपस्या से आशुतोष भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न होकर प्रकट हुए। महादेव ने विंध्याचल को बुद्धि-शुद्धि और अभीष्ट उन्नति का वरदान दिया, साथ ही यह मर्यादा बांधी कि उसका विस्तार कभी प्राणियों के मार्ग में बाधा न बने।

समस्त देवताओं और ऋषियों की प्रार्थना पर भगवान शिव ने वहां दो स्वरूप धारण किए—नर्मदा के ओंकार-आकार द्वीप पर 'ओंकारेश्वर' और तट पर 'ममलेश्वर'। यद्यपि ये दो विग्रह हैं, किंतु शास्त्रों में इन्हें एक ही ज्योतिर्लिंग की संज्ञा दी गई है।

कथा का संदेश

तपस्या अहंकार को विनम्रता में बदल देती है, और विनम्र हृदय में ही ईश्वर का वास होता है।

सामान्य प्रश्न

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