Pauranik Katha

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग: दूषण असुर का वध और मृत्युंजय स्वरूप

अवंतिका नगरी में असुर दूषण के अत्याचार से धर्मपरायण भक्तों की रक्षा हेतु हुंकार भरते हुए महाकाल के प्राकट्य की कथा।

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग: दूषण असुर का वध और मृत्युंजय स्वरूप कथा

संपूर्ण कथा

प्राचीन काल में धर्मनगरी अवंतिका (उज्जैन) में वेदप्रिय नाम के एक परम तेजस्वी ब्राह्मण अपने पुत्रों सहित निवास करते थे, जो निरंतर शिव-आराधना और यज्ञ-अनुष्ठानों में लीन रहते थे। उसी कालखंड में दूषण नामक महाबली असुर ने ब्रह्मा जी के वरदान से उन्मत्त होकर ऋषि-मुनियों और धर्म का संहार आरंभ कर दिया।

दूषण अपनी आसुरी सेना सहित अवंतिका नगरी में पहुंचा और ब्राह्मणों को शिव-पूजा बंद करने का आदेश दिया। ब्राह्मणों ने भयभीत हुए बिना पार्थिव शिवलिंग का ध्यान करते हुए महादेव की स्तुति जारी रखी। जब असुर ने ब्राह्मणों पर प्रहार करने के लिए खड्ग उठाया, तब एकाएक वह पार्थिव लिंग फट गया।

उस विदीर्ण स्थान से काल के भी काल, संहारक 'महाकाल' प्रकट हुए। भगवान शिव ने केवल एक भीषण हुंकार भरी और असुर दूषण अपनी समस्त सेना सहित उसी क्षण भस्म हो गया।

समस्त प्रजा और भक्तों के अनुनय-विनय पर महादेव ने अवंतिका में ही दक्षिण दिशा की ओर मुख करके सदा के लिए वास करना स्वीकार किया। दक्षिण दिशा को मृत्यु (यम) की दिशा माना जाता है; महाकाल का दक्षिणमुखी स्वरूप यह दर्शाता है कि उनकी शरण में आए भक्त का काल भी बाल बांका नहीं कर सकता।

कथा का संदेश

ईश्वर पर अटल विश्वास रखने वाले भक्तों की रक्षा हेतु स्वयं महाकाल सदैव तत्पर रहते हैं।

सामान्य प्रश्न

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