Pauranik Katha

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग: माता-पिता की परिक्रमा और शिव-शक्ति मिलन

कार्तिकेय जी के मान और विरह को शांत करने हेतु श्रीशैलम पर्वत पर शिव-शक्ति के ज्योतिर्लिंग स्वरूप में प्राकट्य की मार्मिक गाथा।

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग: माता-पिता की परिक्रमा और शिव-शक्ति मिलन कथा

संपूर्ण कथा

एक समय कैलाश पर्वत पर भगवान कार्तिकेय और गणेश जी के मध्य यह विवाद उत्पन्न हुआ कि दोनों में से किसका विवाह पूर्व में हो और कौन श्रेष्ठ है। समाधान हेतु देवाधिदेव महादेव और जगदम्बा पार्वती ने शर्त रखी कि जो समस्त पृथ्वी की परिक्रमा कर सर्वप्रथम कैलाश लौटेगा, वही प्रथम पूज्य एवं श्रेष्ठ माना जाएगा।

कार्तिकेय जी तत्काल अपने वाहन मयूर पर आरूढ़ होकर तीव्र गति से भू-परिक्रमा हेतु निकल पड़े। इधर बुद्धि के अधिपति श्री गणेश ने अपने माता-पिता शिव-पार्वती को ही संपूर्ण ब्रह्मांड मानकर श्रद्धापूर्वक उनकी सात बार परिक्रमा की और हाथ जोड़कर खड़े हो गए। उनकी इस मति और धर्मनिष्ठा से प्रसन्न होकर माता-पिता ने गणेश जी को विजयी घोषित किया।

जब कार्तिकेय जी पृथ्वी की परिक्रमा कर लौटे और गणेश जी को सम्मानित देखा, तो वे क्षुब्ध होकर कैलाश त्यागकर सुदूर दक्षिण के क्रौंच पर्वत (श्रीशैलम) पर एकांतवास करने चले गए। पुत्र के विरह में व्याकुल होकर माता पार्वती और भगवान शिव उन्हें मनाने उस पर्वत पर पहुंचे।

पुत्र-स्नेह और शिव-शक्ति के पावन मिलन के उस पावन स्थल पर एक दिव्य ज्योति स्तंभ प्रकट हुआ। 'मल्लिका' (माता पार्वती) और 'अर्जुन' (भगवान शंकर) के संयुक्त स्वरूप के कारण यह पावन धाम 'मल्लिकार्जुन' ज्योतिर्लिंग कहलाया।

कथा का संदेश

माता-पिता की सेवा ही समस्त तीर्थों और ब्रह्मांड की सर्वोच्च परिक्रमा है।

सामान्य प्रश्न

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