Pauranik Katha

जय-विजय को शाप और तीन जन्मों की कथा

वैकुंठ के द्वारपालों जय और विजय के शाप और राक्षस रूप में तीन जन्मों की कथा।

जय-विजय को शाप और तीन जन्मों की कथा कथा

संपूर्ण कथा

जय और विजय वैकुंठ में भगवान विष्णु के द्वारपाल थे। एक दिन सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार भगवान के दर्शन के लिए आए। जय-विजय ने उन्हें भीतर जाने से रोक दिया। इससे क्रुद्ध होकर मुनियों ने उन्हें शाप दिया कि तुम दोनों वैकुंठ से गिरकर पृथ्वी पर जन्म लो।

भगवान विष्णु ने स्वयं आकर मुनियों का सम्मान किया। जय-विजय ने भगवान से पूछा कि अब क्या करें। भगवान ने दो विकल्प दिए: सात जन्म भक्त के रूप में पृथ्वी पर बिताना या तीन जन्म शत्रु के रूप में। उन्होंने शीघ्र लौटने के लिए तीन जन्म चुने।

इसी कारण वे पहले जन्म में हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु बने, दूसरे में रावण और कुंभकर्ण, और तीसरे में शिशुपाल और दंतवक्र। हर बार भगवान ने अवतार लेकर उनका उद्धार किया।

कथा का संदेश

अहंकार चाहे द्वारपाल का ही क्यों न हो, अंततः पतन का कारण बनता है।

सामान्य प्रश्न

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