
संपूर्ण कथा
कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी थीं। अर्जुन ने अपने ही गुरुजनों, पितामह और संबंधियों को सामने देखा तो उनका हृदय व्याकुल हो गया। उनके हाथ काँपने लगे और उन्होंने धनुष नीचे रखकर कहा कि मैं इस युद्ध में अपने ही लोगों को मारकर राज्य नहीं चाहता।
सारथी बने श्री कृष्ण ने तब अर्जुन को उपदेश दिया कि आत्मा अजर-अमर है और शरीर नश्वर। उन्होंने कहा कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म पर है, उसके फल पर नहीं, इसलिए फल की चिंता किए बिना कर्तव्य का पालन करना चाहिए। उन्होंने कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग तीनों का मार्ग समझाया।
अर्जुन के आग्रह पर श्री कृष्ण ने उन्हें अपना विराट रूप दिखाया, जिसे देखकर अर्जुन विस्मित हो गए। उपदेश के अंत में अर्जुन का मोह दूर हुआ और उन्होंने कहा कि मेरा संशय मिट गया है, अब मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा। श्रीमद्भगवद्गीता के अठारह अध्यायों में लगभग सात सौ श्लोक हैं और यह आज भी जीवन का मार्गदर्शक ग्रंथ माना जाता है।
कथा का संदेश
कर्तव्य का निष्काम भाव से पालन करना ही जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
