
संपूर्ण कथा
ऋषि कश्यप की पत्नियाँ कद्रू और विनता थीं। कद्रू के पुत्र सर्प थे और विनता के पुत्र अरुण और गरुड़। एक शर्त के छल में हारकर विनता को कद्रू की दासी बनना पड़ा। गरुड़ ने नागों से माता की मुक्ति का मूल्य पूछा, तो उन्होंने स्वर्ग से अमृत लाने को कहा।
गरुड़ ने स्वर्ग पहुँचकर देवताओं और अमृत की रक्षा करने वाले चक्र को पार किया। उन्होंने अमृत कलश उठा लिया और वहाँ से चल पड़े। रास्ते में भगवान विष्णु ने उनके निर्लोभ से प्रसन्न होकर वर माँगने को कहा।
गरुड़ ने अमरत्व और विष्णु के ऊपर स्थान माँगा, जिसे भगवान ने स्वीकार किया और उन्हें अपना वाहन बना लिया। गरुड़ ने नागों को अमृत कलश कुश पर रखकर दिया और माता को मुक्त कराया, तब इंद्र ने अमृत वापस उठा लिया।
कथा का संदेश
माता-पिता के सम्मान के लिए किया गया पराक्रम सदैव प्रतिष्ठा दिलाता है।
