
संपूर्ण कथा
गांधार देश की राजकुमारी गांधारी का विवाह जन्मांध हस्तिनापुर नरेश धृतराष्ट्र से हुआ। विवाह के बाद गांधारी ने जीवन भर के लिए अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली, ताकि वे पति के समान ही संसार को न देखें।
महर्षि व्यास की सेवा से प्रसन्न होकर गांधारी को सौ पुत्रों का वरदान मिला। लंबे समय तक गर्भधारण के बाद भी संतान न होने पर उन्होंने व्याकुल होकर गर्भ को आघात पहुँचाया, जिससे मांस का एक पिंड निकला।
व्यास ने पिंड को सौ भागों में बाँटकर घी के घड़ों में रखवाया। समय आने पर उनसे सौ पुत्र और एक पुत्री दुःशला का जन्म हुआ। सबसे पहले दुर्योधन का जन्म हुआ, जिसके जन्म के समय अपशकुन हुए थे। यही कौरव कहलाए।
कथा का संदेश
त्याग महान है, पर मोह और अंधभाव से किए गए निर्णय परिवार और राज्य को विनाश की ओर ले जाते हैं।
