
संपूर्ण कथा
कंस वध के उपरांत मगधराज जरासंध ने मथुरा पर निरंतर आक्रमण किए। प्रजा को युद्ध के संकट से बचाने हेतु श्री कृष्ण ने मथुरा छोड़कर पश्चिम समुद्र तट की ओर प्रस्थान किया। उन्होंने समुद्र देव वरुण से प्रार्थना कर बारह योजन भूमि प्राप्त की। इसके पश्चात देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने समुद्र के मध्य एक अलौकिक और सुरक्षित स्वर्ण नगरी का निर्माण किया, जिसके विशाल द्वारों के कारण उसका नाम 'द्वारका' पड़ा।
महाभारत युद्ध की समाप्ति पर अपने सौ पुत्रों के वियोग से व्यथित माता गांधारी ने श्री कृष्ण को शाप दिया कि जिस प्रकार कौरव कुल नष्ट हुआ, उसी प्रकार यदुवंश भी आपसी कलह से समाप्त हो जाएगा। कालान्तर में द्वारका पधारे विश्वामित्र, दुर्वासा और वशिष्ठ जैसे महर्षियों के साथ श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब ने उपहास किया। साम्ब को स्त्री वेष में प्रस्तुत कर ऋषियों से पूछा गया कि इसके गर्भ से क्या जन्मेगा। ऋषियों ने कुपित होकर शाप दिया कि इसके पेट से यदुवंश का नाश करने वाला लोहे का मूसल उत्पन्न होगा।
राजा उग्रसेन के आदेश से उस मूसल को शिला पर घिसकर उसका चूर्ण समुद्र में फेंक दिया गया। मूसल का एक नुकीला लौह टुकड़ा एक मछली ने निगल लिया, जो बाद में जरा नामक शिकारी के हाथ लगा और उसने उससे अपने बाण की नोक तैयार की। समुद्र तट पर पड़े मूसल के चूर्ण से एरका (धारदार घास) उग आई।
समय बीतने पर प्रभास क्षेत्र में एक उत्सव के दौरान यदुवंशी मदिरा और अहंकार के वशीभूत होकर आपस में ही भिड़ गए। उन्होंने उसी घातक एरका घास को उखाड़कर एक-दूसरे पर प्रहार किया और संपूर्ण यदुवंश नष्ट हो गया। इसके उपरांत जब श्री कृष्ण वन में एक पीपल वृक्ष के नीचे योग मुद्रा में विश्राम कर रहे थे, तब जरा शिकारी ने उनके चरण के पद्म को मृग समझकर बाण चला दिया। प्रभु ने अपनी पार्थिव लीला समेट ली और उनके परमधाम गमन के साथ ही संपूर्ण द्वारका नगरी समुद्र की लहरों में समा गई।
कथा का संदेश
अहंकार, संतों का अनादर और आपसी फूट बड़े से बड़े वैभवशाली कुल का भी सर्वनाश कर देती है।
