
संपूर्ण कथा
हस्तिनापुर की द्यूत सभा में शकुनि की चाल से युधिष्ठिर अपना राज्य, भाइयों और स्वयं को हार गए। अंत में उन्होंने द्रौपदी को भी दाँव पर लगा दिया और हार गए। दुर्योधन के आदेश पर दुःशासन द्रौपदी को केश पकड़कर भरी सभा में खींच लाया।
सभा में भीष्म, द्रोण और अन्य बड़े लोग मौन रहे। केवल विकर्ण और विदुर ने इस अन्याय का विरोध किया। जब दुःशासन ने द्रौपदी का वस्त्र खींचना आरंभ किया तो द्रौपदी ने पूर्ण समर्पण से श्री कृष्ण का स्मरण किया।
कथा के अनुसार उनकी साड़ी बढ़ती चली गई और दुःशासन थककर बैठ गया। इस अपमान से क्रोधित होकर भीम ने दुःशासन की छाती का रक्त पीने की और दुर्योधन की जंघा तोड़ने की प्रतिज्ञा की, जो बाद में महाभारत युद्ध में पूर्ण हुई। यह घटना कुरुक्षेत्र युद्ध के प्रमुख कारणों में गिनी जाती है।
कथा का संदेश
अन्याय के सामने चुप रहना भी अधर्म है, और जो सच्चे हृदय से ईश्वर की शरण लेता है, उसकी लाज वे स्वयं रखते हैं।
