
संपूर्ण कथा
शनिदेव का विवाह गंधर्वराज चित्ररथ की कन्या दामिनी से हुआ था, जो अत्यंत पतिव्रता और शीलवान थीं। एक समय देवी दामिनी पुत्र-प्राप्ति की अभिलाषा लेकर शनिदेव के कक्ष में पहुंचीं। उस समय शनिदेव अपने आराध्य भगवान शिव के ध्यान में निमग्न थे और उन्हें बाह्य संसार की कोई सुध नहीं थी।
दामिनी ने अपने पति को कई बार पुकारा, किंतु समाधिस्थ होने के कारण शनिदेव ने कोई उत्तर नहीं दिया। ऋतुकाल के निष्फल होने की आशंका और उपेक्षा से आहत होकर दामिनी ने अत्यंत कुपित होकर शाप दे दिया कि 'तुमने मुझे नहीं देखा, अतः अब तुम्हारी दृष्टि जिस किसी पर भी पड़ेगी, उसका अमंगल होगा।'
जब शनिदेव की समाधि टूटी, तब तक शाप फलीभूत हो चुका था। दामिनी को अपने क्षणिक क्रोध पर भारी पश्चाताप हुआ, किंतु उच्चारित शाप को वापस लेना संभव नहीं था। शनिदेव ने संसार और अपने भक्तों को अपनी संहारक दृष्टि से बचाने के लिए सदैव अपना मस्तक नीचा रखने का प्रण लिया।
कथा का संदेश
क्षणिक क्रोध में दिया गया शाप जीवन भर का पश्चाताप बन जाता है; शनिदेव का झुका हुआ मस्तक उनकी करुणा का प्रमाण है।
