
संपूर्ण कथा
हस्तिनापुर के राजा शांतनु और गंगा के पुत्र देवव्रत युवराज थे। एक दिन राजा शांतनु निषादराज की पुत्री सत्यवती पर मोहित हो गए। निषादराज ने शर्त रखी कि उसकी पुत्री की संतान ही राजा बने, तभी वह विवाह की अनुमति देगा। शांतनु यह शर्त नहीं मान सके और चिंता में डूब गए।
जब देवव्रत को पिता की व्यथा का कारण ज्ञात हुआ तो वे स्वयं निषादराज के पास गए। उन्होंने वचन दिया कि वे राज्य का अधिकार त्याग देंगे। निषादराज के यह कहने पर कि आपकी संतान दावा कर सकती है, देवव्रत ने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया।
इस कठोर प्रतिज्ञा के कारण उनका नाम 'भीष्म' पड़ा। प्रसन्न होकर शांतनु ने उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान दिया। भीष्म ने जीवन भर हस्तिनापुर की सेवा की और महाभारत युद्ध में कौरव सेना के सेनापति बने। अंत में उन्होंने शरशय्या पर लेटकर उत्तरायण आने पर देह त्यागी।
कथा का संदेश
त्याग और वचन-पालन महान चरित्र की पहचान हैं, पर हर प्रतिज्ञा का विवेकपूर्वक पालन भी आवश्यक है।
