
संपूर्ण कथा
ऋषि कहोड़ अपनी पत्नी सुजाता के सामने वेद पाठ कर रहे थे। गर्भस्थ शिशु ने उनके उच्चारण की त्रुटि बताई, तो क्रोधित होकर ऋषि ने शाप दे दिया। जन्म के समय बालक का शरीर आठ स्थानों से टेढ़ा था, इसलिए उसका नाम अष्टावक्र पड़ा।
कहोड़ ऋषि राजा जनक की सभा में विद्वान बंदी से शास्त्रार्थ में हार गए, और शर्त के अनुसार उन्हें जल में डुबो दिया गया। अष्टावक्र ने केवल बारह वर्ष की आयु में जनक की सभा में पहुँचकर बंदी को चुनौती दी। सभा के लोग उनके स्वरूप पर हँसे, परंतु अष्टावक्र ने अपने ज्ञान से सबको मौन कर दिया।
शास्त्रार्थ में बंदी पराजित हुआ। उसने बताया कि वह वरुण का पुत्र है और जल में डुबोए गए सभी ब्राह्मण सुरक्षित हैं। कहोड़ ऋषि लौट आए और अपने पुत्र पर गर्व किया। कहा जाता है कि समंगा नदी में स्नान से अष्टावक्र का शरीर भी सीधा हो गया।
कथा का संदेश
ज्ञान का आकलन शरीर या रूप से नहीं, बुद्धि और विवेक से होता है।
