
संपूर्ण कथा
वनवास के समय अर्जुन दिव्यास्त्र प्राप्त करने के लिए इंद्रकील पर्वत पर तपस्या करने लगे। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर इंद्र ने उन्हें भगवान शिव की आराधना करने की सलाह दी। अर्जुन ने शिव की कठोर साधना आरंभ की।
उसी समय मूक नामक असुर वराह (सूअर) के रूप में अर्जुन पर आक्रमण करने आया। अर्जुन ने उस पर बाण चलाया, उसी क्षण एक किरात (वनवासी शिकारी) का बाण भी उस पर लगा। दोनों में वराह पर अधिकार को लेकर विवाद हो गया।
विवाद युद्ध में बदल गया और अर्जुन के सारे बाण निष्फल हो गए। थककर उन्होंने मिट्टी का शिवलिंग बनाकर पुष्प चढ़ाए, तो वही पुष्प किरात के शरीर पर दिखाई दिए। तब शिवजी ने अपना रूप प्रकट किया और अर्जुन को पाशुपतास्त्र प्रदान किया।
कथा का संदेश
विनम्रता और सच्ची निष्ठा के बिना किसी को भी दिव्य शक्ति नहीं मिलती।
