
संपूर्ण कथा
राजा अंबरीष भगवान विष्णु के परम भक्त थे और एकादशी का व्रत नियमपूर्वक रखते थे। एक बार द्वादशी को व्रत का पारण करने के समय महर्षि दुर्वासा वहाँ पधारे। राजा ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया।
दुर्वासा स्नान करने गए और लौटने में विलंब हुआ। पारण का समय बीतने लगा तो अंबरीष ने ब्राह्मणों की सलाह पर केवल जल ग्रहण करके व्रत पूरा किया। लौटकर दुर्वासा ने इसे अपना अपमान माना और क्रोध में कृत्या नामक राक्षसी उत्पन्न की।
भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र ने उस कृत्या को नष्ट कर दिया और दुर्वासा का पीछा किया। वे ब्रह्मा और शिव की शरण में गए, पर कोई रक्षा नहीं कर सका। अंत में विष्णु ने कहा कि केवल अंबरीष ही क्षमा कर सकते हैं। अंबरीष ने क्षमा कर दिया और चक्र शांत हुआ।
कथा का संदेश
क्षमा और विनम्रता से बढ़कर कोई शक्ति नहीं है, और भक्त का अपमान स्वयं ईश्वर का अपमान माना गया है।
