Pauranik Katha

वीर अभिमन्यु और चक्रव्यूह

महाभारत के तेरहवें दिन सोलह वर्ष के वीर अभिमन्यु द्वारा चक्रव्यूह भेदने और वीरगति पाने की कथा।

वीर अभिमन्यु और चक्रव्यूह कथा

संपूर्ण कथा

महाभारत युद्ध के तेरहवें दिन द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह की रचना की। इसे भेदना केवल अर्जुन और श्री कृष्ण जानते थे। संशप्तक योद्धाओं ने अर्जुन को युद्ध के लिए ललकारकर दूर रणभूमि में उलझा दिया।

तब सुभद्रा-पुत्र अभिमन्यु ने युधिष्ठिर के कहने पर चक्रव्यूह में प्रवेश करने का दायित्व लिया। कहा जाता है कि उसने माता के गर्भ में ही इस व्यूह में प्रवेश करने की विद्या सुनी थी, पर बाहर निकलना नहीं जान पाया था। वह अपने पराक्रम से व्यूह के भीतर घुस गया, परंतु जयद्रथ ने अन्य पांडवों को भीतर जाने से रोक लिया।

भीतर अकेले पड़े अभिमन्यु पर कौरव पक्ष के अनेक महारथियों ने एक साथ आक्रमण कर दिया। उसने वीरता से लड़ते हुए अनेक योद्धाओं को परास्त किया, पर अंत में उसका रथ और शस्त्र नष्ट हो गए और वह वीरगति को प्राप्त हुआ। पुत्र की मृत्यु से क्रोधित अर्जुन ने अगले दिन सूर्यास्त से पहले जयद्रथ का वध करने की प्रतिज्ञा की।

कथा का संदेश

साहस और वीरता के साथ-साथ पूर्ण ज्ञान और सही रणनीति भी आवश्यक होती है।

सामान्य प्रश्न

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