Sundarkand · श्री हनुमान जी

सुन्दरकाण्ड: लङ्किनी विजय एवं लङ्का प्रवेश

सुन्दरकाण्ड: लङ्किनी विजय एवं लङ्का प्रवेश

परिचय

सुन्दरकाण्ड: लङ्किनी विजय एवं लङ्का प्रवेश — सनातन सेवा डिजिटल भक्ति संग्रह। रामचरितमानस सुन्दरकाण्ड का प्रसंग।

ॐ

सुन्दरकाण्ड: लङ्किनी विजय एवं लङ्का प्रवेश

Sundarkand · श्री हनुमान जी

【दोहा】

पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार। अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार॥3॥

【चौपाई】

कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना। चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥ गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै॥ बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥ बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं। नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥ कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं। नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥ करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं। कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥ एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही। रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥

नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥

कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥

【दोहा】

कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि। कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥18॥

【चौपाई】

मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा॥

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