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Katha · भगवान विष्णु
श्री सत्यनारायण व्रत कथा (चतुर्थ अध्याय - कारागार मुक्ति एवं प्रसाद महिमा)

परिचय
श्री सत्यनारायण व्रत कथा (चतुर्थ अध्याय - कारागार मुक्ति एवं प्रसाद महिमा) — सनातन सेवा डिजिटल भक्ति संग्रह। भगवान विष्णु से संबंधित पवित्र कथा और माहात्म्य।
श्री सत्यनारायण व्रत कथा (चतुर्थ अध्याय - कारागार मुक्ति एवं प्रसाद महिमा)
Katha · भगवान विष्णु
【कथा प्रारंभ】
सूत जी बोले— घर में दाने-दाने को तरसती हुई कलावती ने एक दिन किसी विप्र के घर सत्यनारायण व्रत का पूजन देखा और प्रसाद ग्रहण कर घर लौटी। उसने माता लीलावती से व्रत का महत्व कहा। माता-पुत्री ने पश्चाताप करते हुए भगवान सत्यनारायण का पूर्ण भक्ति से पूजन किया और पति तथा दामाद की कुशलता की प्रार्थना की।
प्रसन्न होकर श्री सत्यनारायण ने राजा चंद्रकेतु को स्वप्न में आदेश दिया कि बंदी वणिकों को मुक्त कर उनका धन लौटा दिया जाए। राजा ने दोनों को आदरपूर्वक मुक्त किया और दुगुना धन देकर विदा किया। लौटते समय भगवान ने दंडी संन्यासी वेश में नाव पर जाकर पूछा— नाव में क्या है? वैश्य ने घमंड से असत्य कहा— केवल लता-पत्ते हैं। भगवान ने कहा— तथास्तु। तब नाव के समस्त रत्न बेल-पत्तों में बदल गए।
वैश्य को अपनी भूल का भान हुआ और उसने संन्यासी के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी। प्रभु ने पुनः उसकी नावों को रत्नों से भर दिया। नगर के निकट पहुँचकर जब समाचार मिला, तो कलावती पति-दर्शन की आतुरता में पूजा का प्रसाद छोड़कर नदी तट पर दौड़ी। प्रसाद की अवज्ञा के कारण दामाद नाव सहित जलमग्न हो गया।
【फलश्रुति】
जब कलावती ने लौटकर आदरपूर्वक सत्यनारायण भगवान का प्रसाद ग्रहण किया, तब उसका पति नाव सहित सकुशल प्रकट हो गया। प्रसाद का सम्मान करने से सब संकट टल जाते हैं। इति चतुर्थोऽध्यायः सम्पूर्णः।
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