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Katha · भगवान विष्णु
श्री सत्यनारायण व्रत कथा (तृतीय अध्याय - साधु वैश्य एवं लीलावती)

परिचय
श्री सत्यनारायण व्रत कथा (तृतीय अध्याय - साधु वैश्य एवं लीलावती) — सनातन सेवा डिजिटल भक्ति संग्रह। भगवान विष्णु से संबंधित पवित्र कथा और माहात्म्य।
श्री सत्यनारायण व्रत कथा (तृतीय अध्याय - साधु वैश्य एवं लीलावती)
Katha · भगवान विष्णु
【कथा प्रारंभ】
सूत जी बोले— आगे की कथा सुनो। प्राचीन काल में उल्कामुख नामक धर्मात्मा राजा अपनी पत्नी सहित नदी तट पर सत्यनारायण व्रत कर रहे थे। वहाँ साधु नामक एक धनी वैश्य व्यापारिक नावों सहित रुका। उसने राजा से व्रत का उद्देश्य पूछा और संतान प्राप्ति होने पर स्वयं व्रत करने का संकल्प लिया।
भगवान की कृपा से उसकी पत्नी लीलावती ने एक कन्या को जन्म दिया, जिसका नाम कलावती रखा गया। किंतु वैश्य ने व्रत को टालते हुए कहा कि वह कन्या के विवाह के समय व्रत करेगा। कन्या के योग्य होने पर कांचननगर के एक योग्य वणिक-पुत्र से उसका विवाह कर दिया, किंतु वैश्य ने फिर भी अपना संकल्प पूरा नहीं किया।
सत्यनारायण भगवान के रुष्ट होने पर जब वह दामाद सहित रत्नसारपुर में व्यापार करने गया, तो राजा चंद्रकेतु के राजमहल में हुई चोरी का धन चोरों ने उनकी नाव में छिपा दिया। सिपाहियों ने दोनों को चोर समझकर बंदी बना लिया और राजा ने उनकी सारी संपत्ति जब्त कर उन्हें कारागार में डाल दिया। घर पर भी चोरों ने उनका सारा धन हर लिया।
【फलश्रुति】
सत्य के संकल्प की उपेक्षा करने से मनुष्य को दारुण संकट और अपमान सहना पड़ता है। इति तृतीयोऽध्यायः सम्पूर्णः।
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