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Katha · भगवान विष्णु
श्री सत्यनारायण व्रत कथा (द्वितीय अध्याय - विप्र एवं काष्ठविक्रेता)

परिचय
श्री सत्यनारायण व्रत कथा (द्वितीय अध्याय - विप्र एवं काष्ठविक्रेता) — सनातन सेवा डिजिटल भक्ति संग्रह। भगवान विष्णु से संबंधित पवित्र कथा और माहात्म्य।
श्री सत्यनारायण व्रत कथा (द्वितीय अध्याय - विप्र एवं काष्ठविक्रेता)
Katha · भगवान विष्णु
【कथा प्रारंभ】
सूत जी बोले— हे मुनिश्रेष्ठों! अब मैं सत्यनारायण व्रत की उस प्राचीन कथा का वर्णन करता हूँ, जिसे भगवान ने स्वयं कहा था। काशी के सुंदर नगर में शतानंद नामक एक दरिद्र ब्राह्मण रहता था। वह भूख-प्यास से व्याकुल होकर प्रतिदिन भिक्षाटन के लिए पृथ्वी पर भटकता था।
भगवान श्रीहरि ने एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर उससे उसकी व्यथा पूछी और सत्यनारायण व्रत का विधान बताया। ब्राह्मण ने निश्चय किया कि वह यह व्रत अवश्य करेगा। उस दिन भिक्षा में उसे प्रचुर धन मिला। उसने परिवार और बंधु-बांधवों सहित व्रत किया, जिससे उसकी समस्त दरिद्रता नष्ट हो गई।
एक दिन जब वह ब्राह्मण पूजन कर रहा था, तब एक वृद्ध काष्ठविक्रेता (लकड़हारा) सिर पर लकड़ियों का गट्ठर रखकर वहाँ आया। उसने ब्राह्मण से पूछा— हे विप्र! आप यह किसका पूजन कर रहे हैं? ब्राह्मण ने सत्यनारायण भगवान की महिमा बताई। लकड़हारे ने संकल्प किया कि आज लकड़ी बेचने से जो धन मिलेगा, उसी से वह भी व्रत करेगा।
【फलश्रुति】
उस दिन बाजार में उसकी लकड़ियां दोगुने मूल्य पर बिकीं। लकड़हारे ने केले, शर्करा, घी, दूध और गेहूं के आटे से भगवान का पूजन किया। व्रत के प्रभाव से वह धन-धान्य, पुत्र और सुखी जीवन पाकर अंत में वैकुंठ धाम को गया। इति द्वितीयोऽध्यायः सम्पूर्णः।
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