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Ekadashi · भगवान विष्णु
देवशयनी एकादशी माहात्म्य (चातुर्मास प्रारंभ)

परिचय
देवशयनी एकादशी माहात्म्य (चातुर्मास प्रारंभ) — सनातन सेवा डिजिटल भक्ति संग्रह। भगवान विष्णु से संबंधित पवित्र कथा और माहात्म्य।
देवशयनी एकादशी माहात्म्य (चातुर्मास प्रारंभ)
Ekadashi · भगवान विष्णु
【संकल्प ध्यान】
सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्। विबुद्धे त्वयि बुद्धं च प्रसन्नो मे भवाच्युत॥
【कथा सारांश】
आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। इस दिन से भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर चार मास के लिए शयन करते हैं, जिसे चातुर्मास कहा जाता है। इस अवधि में विवाह आदि समस्त मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं और जप, तप, मौन तथा स्वाध्याय का विशेष महत्व होता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को चक्रवर्ती राजा मांधाता की कथा सुनाई। जब उनके राज्य में तीन वर्ष तक भीषण अकाल पड़ा, तब अंगिरा ऋषि के आदेश पर राजा ने संपूर्ण प्रजा सहित आषाढ़ शुक्ल एकादशी का विधानपूर्वक व्रत किया। व्रत के प्रभाव से मेघों ने मूसलाधार वर्षा की और राज्य पुनः धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया।
【फलश्रुति】
देवशयनी एकादशी का व्रत करने से साधक को ब्रह्महत्या आदि घोर पापों से मुक्ति मिलती है और चातुर्मास के नियमों का पालन करने से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है।
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