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Ekadashi · भगवान विष्णु
निर्जला एकादशी माहात्म्य (भीमसेनी एकादशी)

परिचय
निर्जला एकादशी माहात्म्य (भीमसेनी एकादशी) — सनातन सेवा डिजिटल भक्ति संग्रह। भगवान विष्णु से संबंधित पवित्र कथा और माहात्म्य।
निर्जला एकादशी माहात्म्य (भीमसेनी एकादशी)
Ekadashi · भगवान विष्णु
【संकल्प ध्यान】
एकादश्यां निराहारः स्थित्वाहमपरेऽहनि। भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत॥
【कथा सारांश】
महाभारत काल में महाबली भीमसेन ने महर्षि वेदव्यास जी से निवेदन किया— हे पितामह! युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव वर्ष की सभी एकादशियों का निर्जल व्रत करते हैं, किंतु मेरे उदर में वृक नामक अग्नि होने के कारण मैं भूख सहन नहीं कर पाता। कृपा कर मुझे कोई ऐसा एक व्रत बताइए जिसके पालन से मुझे समस्त एकादशियों का फल प्राप्त हो सके।
व्यास जी ने कहा— हे भीमसेन! ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी को जल की एक बूंद भी ग्रहण किए बिना पूर्ण निर्जल उपवास करो। केवल आचमन में नाममात्र जल की अनुमति है। सूर्योदय से अगले दिन सूर्योदय तक निराहार-निर्जल रहने से वर्ष भर की सभी चौबीस एकादशियों का संपूर्ण पुण्य एक साथ प्राप्त हो जाता है। भीमसेन ने इस व्रत का निष्ठापूर्वक पालन किया और मोक्ष पद के अधिकारी बने।
【फलश्रुति】
जो मनुष्य निर्जला एकादशी का पूर्ण श्रद्धा से व्रत कर वस्त्र, जल से भरा घट, फल और मिष्ठान का दान करते हैं, वे यम की यातनाओं से मुक्त होकर भगवान विष्णु के परम धाम वैकुंठ को प्राप्त करते हैं।
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