Suktam · भगवान विष्णु

पुरुष सूक्तम् (ऋग्वेद १०.९०)

पुरुष सूक्तम् (ऋग्वेद १०.९०)

परिचय

पुरुष सूक्तम् (ऋग्वेद १०.९०) — सनातन सेवा डिजिटल भक्ति संग्रह। भगवान विष्णु की पारंपरिक उपासना।

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पुरुष सूक्तम् (ऋग्वेद १०.९०)

Suktam · भगवान विष्णु

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। स भूमिं विश्वतो वृत्वा अत्यतिष्ठद् दशाङ्गुलम्॥१॥

पुरुष एवेदं सर्वं यद् भूतं यच्च भव्यम्। उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति॥२॥

एतावानस्य महिमा अतो ज्यायांश्च पूरुषः। पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥३॥

त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः। ततो विष्वङ् व्रजक्रामन् साशनानशने अभि॥४॥

तस्माद् विराडजायत विराजो अधि पूरुषः। स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिमथो पुरः॥५॥

यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत। वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः॥६॥

सप्तास्यासन्पराययः त्रिःसप्त क्रत्वोऽभिवर्धन्त। देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन्पुरुषं पशुम्॥७॥

तम् यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः। तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये॥८॥

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