
मां काली
मां काली
देवी महात्म्य के अनुसार रक्तबीज नाम के असुर को वरदान था कि उसके रक्त की हर बूंद जमीन पर गिरते ही एक नया रक्तबीज बना देगी। देवी जितना उसे मारतीं, उतने ही नए असुर खड़े हो जाते। तब देवी दुर्गा के क्रोध से काली प्रकट हुईं। उन्होंने रक्तबीज के शरीर से बहता हर रक्त अपने मुख में ले लिया, ताकि एक भी बूंद धरती पर न गिरे। इस तरह उसका अंत हुआ।
संस्कृत में काल का अर्थ समय भी है और मृत्यु भी। काली वह शक्ति है जो समय के रूप में सब कुछ अपने भीतर समेट लेती है। इसलिए उन्हें कालिका और महाकाली भी कहा जाता है। तंत्र और शाक्त परंपरा में काली दस महाविद्याओं में पहली मानी जाती हैं।
मंत्र
ॐ क्रीं कालिकायै नमः
हे कालिका, आपको नमस्कार।
मां काली का स्वरूप, कथा और पूजा
रक्तबीज और काली की कथा
देवी महात्म्य के अनुसार रक्तबीज नाम के असुर को वरदान था कि उसके रक्त की हर बूंद जमीन पर गिरते ही एक नया रक्तबीज बना देगी। देवी जितना उसे मारतीं, उतने ही नए असुर खड़े हो जाते। तब देवी दुर्गा के क्रोध से काली प्रकट हुईं। उन्होंने रक्तबीज के शरीर से बहता हर रक्त अपने मुख में ले लिया, ताकि एक भी बूंद धरती पर न गिरे। इस तरह उसका अंत हुआ।
काली नाम का अर्थ
संस्कृत में काल का अर्थ समय भी है और मृत्यु भी। काली वह शक्ति है जो समय के रूप में सब कुछ अपने भीतर समेट लेती है। इसलिए उन्हें कालिका और महाकाली भी कहा जाता है। तंत्र और शाक्त परंपरा में काली दस महाविद्याओं में पहली मानी जाती हैं।
स्वरूप के प्रतीक
काला रंग: सबको अपने में समा लेने वाला, सीमा रहित स्वरूप।
मुंडमाला: काल के आगे सब बराबर हैं और अहंकार का अंत है। कुछ व्याख्याओं में इन्हें वर्णमाला के अक्षरों से भी जोड़ा जाता है।
खड्ग: अज्ञान और भ्रम को काटने वाली शक्ति।
जीभ बाहर निकली हुई: एक कथा के अनुसार क्रोध में काली का पैर शिव जी की छाती पर पड़ गया। उन्हें पहचानते ही लज्जा से उनकी जीभ बाहर निकल आई। दूसरी व्याख्या इसे रजोगुण की अभिव्यक्ति मानती है।
शिव के ऊपर खड़े रहना: शिव चेतना हैं और शक्ति ऊर्जा। दोनों के बिना सृष्टि अधूरी है।
रौद्र रूप डराता क्यों है
कई संतों ने इस रूप को इसलिए चुना क्योंकि यह सच को सीधे दिखाता है। काली मृत्यु से छिपाती नहीं, उसका सामना करना सिखाती हैं। रामकृष्ण परमहंस ने दक्षिणेश्वर के काली मंदिर में बरसों इसी मां के रूप में साधना की। उनके लिए काली डराने वाली नहीं, गोद लेने वाली मां थीं। बंगाल की भक्ति परंपरा में रामप्रसाद सेन जैसे कवियों ने भी काली को मां की तरह पुकारा है।
काली पूजा कब होती है
बंगाल, असम और ओडिशा में काली पूजा कार्तिक मास की अमावस्या को होती है, जो दीवाली की रात है। इसके अलावा शुक्रवार, अमावस्या और नवरात्रि में भी उपासना होती है। प्रसिद्ध मंदिरों में कोलकाता का कालीघाट और दक्षिणेश्वर काली मंदिर शामिल हैं। वहां जाने से पहले आधिकारिक सूचना से समय और नियम देख लें।
घर पर सरल पूजा
लाल या काले कपड़े पर मां काली का चित्र रखें और दीपक जलाएं।
लाल गुड़हल का फूल चढ़ाएं, जो परंपरा में काली को प्रिय माना गया है।
भोग में खीर, मिठाई या फल रखें।
मंत्र जप करें और आरती करें।
तंत्र साधना और कठिन विधियां बिना योग्य गुरु के घर पर न करें। सामान्य गृहस्थ के लिए सात्विक पूजा और मंत्र जप ही पर्याप्त माना गया है।
मां काली के मंत्र
ॐ क्रीं कालिकायै नमः
यह सबसे प्रचलित बीज मंत्र वाला जाप है। कई लोग जय मां काली का सरल नाम जप भी करते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
काली और दुर्गा में क्या संबंध है?
कथा में काली दुर्गा के क्रोध से प्रकट होती हैं। शाक्त परंपरा में दोनों एक ही आदिशक्ति के रूप हैं। नवदुर्गा वाले लेख में कालरात्रि का रूप भी देखें।
क्या मां काली की पूजा घर में कर सकते हैं?
हां, सात्विक तरीके से कर सकते हैं। उग्र साधनाओं के लिए गुरु का मार्गदर्शन चाहिए।
काली पूजा और दीवाली एक ही दिन क्यों होती है?
बंगाल और पूर्वी भारत में कार्तिक अमावस्या पर काली की पूजा होती है, जबकि उत्तर भारत में उसी रात लक्ष्मी पूजा होती है।
मां काली की जीभ बाहर क्यों है?
सबसे प्रचलित कथा में गलती से शिव जी पर पैर पड़ जाने की लज्जा बताई जाती है। अलग अलग परंपराओं में अलग व्याख्या मिलती है।
