
गायत्री माता
गायत्री माता
हम उस सृष्टिकर्ता के श्रेष्ठ तेज का ध्यान करते हैं, जो पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग में व्याप्त है। वह हमारी बुद्धि को सही मार्ग पर प्रेरित करे।
ध्यान दें कि इसमें किसी से धन, पद या मनोकामना नहीं मांगी गई है। प्रार्थना केवल एक चीज की है, सद्बुद्धि की। यही इस मंत्र की सबसे अलग बात है।
मंत्र
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
हम उस पवित्र सविता के तेज का ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करे।
गायत्री मंत्र का अर्थ और जप विधि
मंत्र
ॐ भूर्भुवः स्वः।तत्सवितुर्वरेण्यं।भर्गो देवस्य धीमहि।धियो यो नः प्रचोदयात्॥
शब्द दर शब्द अर्थ
ॐ: ब्रह्म का आदि नाद, परमात्मा का प्रतीक।
भूः: पृथ्वी लोक, या प्राण का आधार।
भुवः: अंतरिक्ष लोक, या दुखों को दूर करने वाला।
स्वः: स्वर्ग लोक, या सुख देने वाला।
तत्: उस।
सवितुः: सविता देव का, यानी सबको उत्पन्न करने वाले का।
वरेण्यं: वरण करने योग्य, श्रेष्ठ।
भर्गः: तेज, जो अज्ञान को जला दे।
देवस्य: उस देव का।
धीमहि: हम ध्यान करते हैं।
धियः: हमारी बुद्धियों को।
यः: जो।
नः: हमारी।
प्रचोदयात्: प्रेरित करे, सही दिशा दे।
सरल भावार्थ
हम उस सृष्टिकर्ता के श्रेष्ठ तेज का ध्यान करते हैं, जो पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग में व्याप्त है। वह हमारी बुद्धि को सही मार्ग पर प्रेरित करे।
ध्यान दें कि इसमें किसी से धन, पद या मनोकामना नहीं मांगी गई है। प्रार्थना केवल एक चीज की है, सद्बुद्धि की। यही इस मंत्र की सबसे अलग बात है।
मंत्र कहां से आया
गायत्री मंत्र ऋग्वेद के तीसरे मंडल में आता है। इसके द्रष्टा ऋषि विश्वामित्र माने जाते हैं। मंत्र का छंद गायत्री है, जिसमें चौबीस अक्षर होते हैं, और इसके देवता सविता यानी सूर्य के रूप में उपास्य परमात्मा हैं। यही मंत्र यजुर्वेद और सामवेद में भी आता है। इसी कारण परंपरा में गायत्री को वेदमाता कहा गया है, यानी चारों वेदों का सार।
सूर्य उपासना के साथ इसका संबंध होने से अर्घ्य की विधि वाला लेख भी सहायक रहेगा।
गायत्री माता का स्वरूप
पौराणिक चित्रों में गायत्री माता को पांच मुखों और दस हाथों वाली देवी के रूप में दिखाया जाता है, कमल पर विराजमान। पांच मुखों को पंचतत्व या पंच प्राण से जोड़कर समझाया जाता है। कुछ ग्रंथों में उन्हें ब्रह्मा जी की शक्ति के रूप में बताया गया है। कुछ परंपराओं में सावित्री और सरस्वती से उनका संबंध जोड़ा गया है। सरस्वती जी वाले लेख में ज्ञान की देवी का अलग रूप मिलता है।
जप की सही विधि
स्नान करके साफ कपड़े पहनें और शांत जगह चुनें।
आसन पर सीधे बैठें। परंपरा में पूर्व की ओर मुंह करने की बात कही गई है।
हाथ में जल लेकर आचमन करें और मन में शांति लाएं।
माला से जप करें। 108 मनकों की माला का उपयोग सामान्य है। चंदन, तुलसी या रुद्राक्ष की माला परंपरा में बताई जाती है।
उच्चारण पर ध्यान दें। जल्दबाजी में बोलने से बेहतर है धीरे और साफ बोलना।
जप के बाद कुछ क्षण शांत बैठें।
जप का समय
परंपरा में संध्या के तीन समय बताए गए हैं: प्रातः सूर्योदय से पहले, दोपहर और सायं सूर्यास्त के समय। सुबह का जप सबसे ज्यादा प्रचलित है। शुरुआत करने वालों के लिए रोज 11 बार भी पर्याप्त है, फिर धीरे धीरे 21 या 108 तक बढ़ाएं। नियमित रहना संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है।
क्या महिलाएं गायत्री मंत्र जप सकती हैं
इस पर परंपराओं में अलग राय रही है। कुछ पुरानी परंपराएं उपनयन से जोड़ती थीं। आर्य समाज और हरिद्वार के गायत्री परिवार जैसी परंपराएं सभी के लिए जप को खुला मानती हैं। पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने इसे विशेष रूप से सबके लिए प्रचारित किया। अपनी पारिवारिक परंपरा और गुरु की सलाह के अनुसार चलें।
जप का असर
परंपरा कहती है कि इससे मन शांत और बुद्धि स्थिर होती है। कई लोगों के लिए यह एकाग्रता और अनुशासन की आदत बनाने का तरीका है। इसे चिकित्सा या परीक्षा में सफलता का पक्का उपाय बताकर नहीं लिखना चाहिए। यह साधना का साधन है, कोई गारंटी नहीं।
गायत्री जयंती
गायत्री जयंती की तिथि को लेकर मतभेद है। कई पंचांग इसे ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी पर मानते हैं, जबकि कुछ क्षेत्रों में श्रावण पूर्णिमा से जोड़ा जाता है। हर साल तिथि पंचांग से जांच लें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
गायत्री मंत्र कितनी बार जपना चाहिए?
शुरुआत में 11 बार, फिर 21 या 108 बार। नियमित रहना ज्यादा जरूरी है।
क्या गायत्री मंत्र किसी भी समय पढ़ सकते हैं?
संध्या के तीन समय सबसे उत्तम माने गए हैं, पर मन से किया गया जप किसी भी समय किया जा सकता है।
गायत्री मंत्र का सबसे सरल अर्थ क्या है?
उस श्रेष्ठ तेज का ध्यान, जो हमारी बुद्धि को सही मार्ग पर प्रेरित करे।
गायत्री माता को वेदमाता क्यों कहते हैं?
क्योंकि गायत्री मंत्र को चारों वेदों का सार माना गया है।
